Coherence
January 31, 2017
निदा फ़ाज़ली साहब को याद करते हुए
February 9, 2017

6 दिसम्बर बिकता है

Surbhi Karwa

2016 नवम्बर में अयोध्या आना हुआ. राम और उनके राज्य के ‘दर्शन’ से ज्यादा मेरी दिलचस्पी उस विवादास्पद ज़मीन की और उसकी वर्तमान स्थिति के ‘दर्शन’ की थी, जिस पर स्वामित्व की लड़ाई ने संवैधानिक आदर्शों को तार-तार करके रख दिया. हालाँकि लाइन में खड़े-खड़े इस बात का ज़िक्र जब मैनें अपनी दोस्त से किया तो उसने मुझे ऐसी बातें धीरे बोलने को कहा, और यह भी कि अगर किसीने पूछा तो वो कह देगी कि मैं उसके साथ नहीं हूँ. खैर, वहां का माहौल ऐसी जहरीली चुप्पी से भरा हैं कि आप ज्यादा चिल्लाकर कुछ भी बोले तो पुलिस आकर शायद आपसे पूछताछ करने लगे.

अयोध्या में जो देखा उसे कहेंगे ‘धर्म की बढ़िया पैकेजिंग’. हर घर में सीता की रसोई, Ayodhyaभरत का कमरा हैं, जहाँ सेल्समेन की तरह कुछ लोग आने को कहेंगे, फिर बातों-बातों में श्रद्धानुसार दान देने के नाम पर अपनी जेबें भरेंगे. कोई जबरदस्ती का गाइड बनकर धन मांगेगा. बाकायदा बाज़ार की ही तरह अलग-अलग विक्रेताओं में ‘कॉम्पीटिशन’ भी नज़र आएगा. भगवान बिकते देख अच्छा नहीं लगता.

वैसे ये समस्या हर बड़े संगठित धर्म के धर्म स्थल पर देखने को मिलेगी. ऐसा क्यों हैं कि किसी भी बड़े मंदिर या मस्जिद आदि के पास बड़ी-बड़ी होटलें, चकाचौंध कर देने वाले व्यापर केंद्र और बाज़ार है?

पर धर्म के इस व्यापारीकरण हेतु संतनुमा बनियों पर दोषारोपण करना एक तरफ़ा होगा. इसके लिए हम लोग भी बराबरी के ज़िम्मेदार हैं. आधुनिकता और उपभोगवाद ने हमें और अधिक ईश्वर भीरु बना दिया हैं. कभी उपभोगवाद के पापों से निजाद पाने के लिए तो कभी ‘और’ पाने की चाहत में हम आम इंसान मंदिरों में दान दे-दे कर अपने डरों को, अपनी खाइयों को भरना चाहता हैं. अब ऐसे में जहाँ डिमांड हैं, वहां सप्लाई तो होगी ही, ये तो अर्थव्यवस्था का सिद्धांत हैं.Ayodhya1

हर मंदिर के आस पास छोटे-बडे प्रसाद बेचने वाले, छोटा- मोटा सामान बेचने वाले मिल जायेंगे. इन स्थानीय लोगों को जो ऐसी दुकानें चला रहे हैं असल में वो अपने घर चला रहे होते हैं.वे इस पूरे खेल में बहुत छोटे प्यादे हैं जो सिर्फ अपना गुज़ारा करना चाहते हैं पर असली गंगोत्री तो कही और ही हैं. बड़े-बड़े सीईओ की तरह पूरा समुचित रूप से क्रियान्वित मॉडल चलता है ‘श्रद्धालुओं’ को बेवकूफ बनाने का.

पर अयोध्या में सिर्फ राम नहीं बिकते, वहां तो राम के नाम में ६ दिसम्बर भी बिकता हैं. राम मंदिर राजनैतिक उद्दश्यों की प्राप्ति हेतु एक हथकंडा ही नहीं हैं, बल्कि राजनैतिक के साथ- साथ इसका एक व्यापारिक पहलु भी हैं.  बाबरी मस्जिद गिराने की घटना की विडियो सीडी बिकती हैं, और मंदिर बनाने के नाम पर अपना नाम लिखवा कर शिला लगवाने का व्यापार अयोध्या में बिलकुल जोर- शोर से चल रहा हैं. खैर मंदिर बनवाने के लिए आने वाले पत्थर तो लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं. तो भाई, सार यह हैं कि ६ दिसम्बर भी बिकता हैं.

सारा शहर गंदगी से अटा पड़ा हैं. नागेश्वर नाथ मंदिर के पास बने घाट से तो गुजरना दूभर हैं. देश के बाकि स्थानीय स्वशासन निकायों की तरह अयोध्या के निकाय भी साधनों की कमी के जूझ रहे हैं. ( इस सम्बन्ध में शारदा दुबे की ‘अयोध्या की तस्वीरें’ पढियेगा). शायद राम, अपने मंदिर के बजाय अपने राज्य को साफ़ देखकर ज्यादा खुश होते.नहीं ? खैर! मंदिर यही बनायेंगे! तो बनाइये!

 


सुरभि करवा, राष्ट्रिय विधि विश्विद्यालय, लखनऊ में विधि स्नातक की छात्रा हैं.किताबों को पढ़ते पढ़ते उनका ये एहसास गहरा हुआ कि वो समाजशास्त्र की छात्रा अधिक हैं और कानून को उसका आवश्यक हिस्सा मानती हैं. विधिक सहायता समिति की सदस्य होने के नाते आम जनता में कानूनी जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करती हैं, उनका मानना है कला और साहित्य, ने नयी नयी चीज़ों में दिलचस्पी पैदा कर उनके मिजाज़ को आवारा बन दिया है.