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परम्पराओं में चुनाव की स्वतंत्रता: सवाल स्त्री सन्दर्भ के

Surbhi Karwa

 

हर साल करवा चौथ पर सोशल मीडिया पर एक लघुजीवी बहस शुरू होती है जहाँ एक ओर कुछ लोग करवा चौथ को पितृसत्ता का प्रतिरूप, और करवा चौथ करने वाली महिलाओं को दबी-कुचली सोच से पीड़ित समझ कर हंसी का पात्र मानते हैं, वही दूसरी और एक वर्ग इसे हमारी भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्परा बताकर इसके महत्व का हिमायती बनता हैं. ऐसी ही कुछ स्थिति रक्षा बंधन के वक़्त भी होती है.

ये दोनों ही परम्पराएं एक सवाल उठाती हैं कि एक प्रगतिशील समाज का ऐसी परम्पराओं के सन्दर्भ में क्या रुख हो? और उन महिलाओं के प्रति क्या रुख हो जो इन साफ़ तौर स्त्री विरोधी दिखने वाली परम्पराओं को अपनाती हैं, निभाती हैं. क्या उन्हें पुरातनपंथी मानकर उनकी अवहेलना की जाये? परन्तु क्या इससे प्रगतिशील विचारधारा के विकास में हानि नहीं पहुँचती, खासकर क्योंकि भारत एक उत्सवधर्मी और परम्परावादी देश है.

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि कई भारतीय परम्पराएं स्त्री विरोधी है और मुख्यत: एक पितृसत्तात्मकता की बू से सनी पड़ी हैं. उदहारण के तौर पर – करवाचौथ उसी विश्वास का नतीजा है जो स्त्री का अस्तित्व और उसकी ख़ुशी पति के होने या न होने से निर्धारित करती है. पति जीवित है तो सब कुछ हैं, वो नहीं तो कुछ नहीं. और इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि अपने पति की दीर्घायु के लिए स्त्री व्रत रखे. ये धारणाएँ अत्यंत सडी-गली हैं और त्याग देने योग्य हैं. पर क्या इस धारणा पर आधारित परम्परा भी त्याग देने योग्य है? क्या धारणा और उससे जुड़ी परम्परा पृथक्करणीय नहीं हैं?

हमें परम्पराओं में भी चुनाव के महत्व को समझना चाहिए. ‘फ्री विल’ का महत्व समझना चाहिए. अपनी इच्छा अनुसार जीने की स्वतंत्र में परम्परा के चुनाव की स्वतंत्रता भी शामिल है. जब देख कर और सोच कर एक स्त्री अपनी स्वतंत्र इच्छा से किसी स्त्री विरोधी परम्परा को अपनाती है तो उसका स्त्री विरोधी अंश समाप्त सा हो जाता हैं क्योंकि उस परम्परा का स्त्री विरोधी भाव उस स्त्री की व्यक्तिगत भावनाओं के समक्ष गौण हो जाता है (शायद पूरी तरह स्थानांतरित न हो). हालांकि हमारे समाज में ‘फ्री विल’ कितनी फ्री है और कितनी जबरन, ये बहुत बड़ा सवाल हैं.

वास्तव में प्रगतिशील विचारधारा को जरुरत इस बात कि है कि वह परम्पराओं के चुनाव के सन्दर्भ में भी ‘नेगोशिएबल स्पेस’ बनाने और बढ़ाने की ओर कार्य करें. ये नेगोशिएशन परिवार से शुरू होकर एक वृहद समाज तक होगी.

धर्मवीर भारती ने अपने संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ में लिखा है-

“यदि विश्वास प्रत्यक्षत: जानलेवा या नस्ल-जाति, मज़हब और लिंग के आधार पर किसी समुदाय के लिए अपमानजनक हो, तब तो उन्हें अंधविश्वास कहकर उनका शीघ्रातिशीघ्र निराकरण ही एकमात्र कर्तव्य है, यदि कुछ विश्वास विज्ञानसम्मत न होकर भी उक्त तरह से हानिकारक न हो तो उनके साथ भी क्या उसी तरह का बर्ताव उचित है? ऐसा करने में क्या हमारे सांस्कृतिक मन के खाली- खाली हो जाने का खतरा नहीं हैं?”

भारती जी की ये बात जहाँ विश्वास और अन्धविश्वास के सन्दर्भ में है. पर एक तरह से हमारी परम्पराओं के सन्दर्भ में भी समझी जा सकती हैं. अगर हम सभी परम्पराओं को छोड़ देंगे तो हमारा सांस्कृतिक जीवन खाली- खाली हो जायेगा. आवश्यकता यह है कि हर परम्परा को कसौटी पर कसा जाये और उनके चुनाव के संदर्भ में ‘नेगोशिएबल स्पेस’ को बढ़ाया जाये.

 


 

सुरभि करवा, राष्ट्रिय विधि विश्विद्यालयलखनऊ में विधि स्नातक की छात्रा हैं.किताबों को पढ़ते पढ़ते उनका ये एहसास गहरा हुआ कि वो समाजशास्त्र की छात्रा अधिक हैं और कानून को उसका आवश्यक हिस्सा मानती हैं. विधिक सहायता समिति की सदस्य होने के नाते आम जनता में कानूनी जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करती हैं, उनका मानना है कला और साहित्य, ने नयी नयी चीज़ों में दिलचस्पी पैदा कर उनके मिजाज़ को आवारा बन दिया है.