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मैं हिजड़ा … मैं लक्ष्मी!

Surbhi Karwa

 

‘मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी!’ ये किताब हाथ में लेकर चलने से पहले, मुझे लोगों की अनचाही नज़रों का शिकार होने की चिंता होती है. शायद मेरी ये चिंता बहुत खुले तौर पर हिज़डा समुदाय के प्रति समाज के दृष्टिकोण को उजागर करती है. समाज उनसे नफरत नहीं करता, पर ‘उनके’ आसपास होने पर अस्वाभाविक जरुर महसूस करता हैं.

मुझे बचपन की एक घटना याद है. पिताजी के साथ कहीं जाते हुए, सड़क पर मैंने इस समुदाय के सन्दर्भ में पूछना शुरू किया तो वे बेहद असहज हो गए. घर चल कर बात करेंगे – ऐसा कई बार कहने पर भी जब मैं नहीं मानी तो उन्होंने मुझे समझाया कि पिछले जन्म में कुछ गलत करने पर आप ऐसे पैदा होते हैं . ये बात उजागर करती है समाज में इस समुदाय के बारे में सही जानकारी नहीं होने पर फैले कुज्ञान को.

ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति फैले हमारे पूर्वाग्रहों और उनके बारे में जानकारी के अभाव इन्हीं दोनों को समाप्त करने की कोशिश करती है, ये किताब – मैं हिज़डा..मैं लक्ष्मी!. यह लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी उर्फ़ “राजू,” हिन्दुस्थान के ट्रांसजेंडर अधिकारों पर कार्य करने वालों में एक अग्रणी नाम, की आत्मकथा है.

यह किताब छोटे पर सारगर्भित रूप में भारतीय हिजड़ा समाज जिसका चौराहों, रेलों और ख़ुशी के मौकों पर बधाई मांगने के अलावा मुख्य समाज से अधिक संपर्क नहीं है, की परम्पराओं और इतिहास का वर्णन करती है. पश्चिम के अधिकाँश देशों से अलग भारतीय ट्रांसजेंडर समुदाय एक पारंपरिक समाज, जिसके अपने नियम और परम्परा हैं, के रूप में चला आ रहा हैं. ये समुदाय एडवोकेसी समूह के बजाय समाज से धकिया दिए गए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का समूह है जो गुरु-चेला परम्परा पर चलता है. पर इनकी परम्पराओं और नियमों के सन्दर्भ में बाहर का समाज मात्र अटकलें लगाता है और अफवाहें उड़ाता है. यह किताब शायद पहली बार हो कि इस समुदाय का हिस्सा स्वयं इतना खुल कर इन परम्पराओं का वर्णन कर रहा है. हालाँकि इसके लिए लक्ष्मी को समुदाय का विरोध सहना पड़ा. पर लक्ष्मी का मानना है कि हिजड़ा समाज को मुख्यधारा में जुड़ना चाहिए और इसके लिए अपने बारे में, अपने समाज के बारे में खुल कर बताना चाहिए. और ये साफ़गोई किताब की हर पंक्ति में झलकती है.

ये किताब जेंडर और जेंडर आइडेंटिटी, सेक्सुअल ओरिएनटेशन, जेंडर एक्सप्रेशन पर भी विस्तार से चर्चा कर बेसिक जानकारी उपलब्ध करवाती हैं. मात्र 176 पन्नों की ये किताब न केवल हिजड़ों बल्कि gay, lesbians, और खास कर transgender के सन्दर्भ में हमारे कई मिथकों को तोड़ती हैं. इन सबके सन्दर्भ में मानसिक और शारीरिक पहलुओं का ज़िक्र करती है.

Lakshmi Narayan Tripathi

यह दूसरी किताब है जिसे मैंने मात्र दो सिटींग में बैठ कर पूरा किया हो. शब्दांकन वैशाली रोडे का है. डा. शशिकला राय और सुरेखा बनकर का अनुवाद इतना जबरदस्त है कि किताब हाथ से छोड़ने का मन नहीं होता.

लक्ष्मी हिजड़ा समुदाय की भी रेबेल है. एक बार समुदाय में शामिल होकर किसी का चेला हो जाने के बाद, हिजड़ो के लिए परिवार में रहना वर्जित है. पर लक्ष्मी समुदाय में शामिल हुई, लता गुरु की चेला बनी, अपने खुद के चेले बनाये पर अपना परिवार नहीं छोड़ा. एक ही बिल्डिंग में उनके दो-दो परिवार चलते रहे. इसे इस समुदाय और समाज में बेहतर कम्युनिकेशन और बेहतर जुड़ाव की और महत्वपूर्ण कदम माना जाना चाहिए.

ये किताब बच्चे, और उनमें जेंडर कन्फर्मेशन और जेंडर आइडेंटिटी के सवालों का जीवित अकाउंट है. अपने बारे में कुछ अलग होने का एहसास लक्ष्मी को बहुत शुरू से ही होने लगा था. वैसे भी टीनऐज बड़ी कन्फ्युसिंग उम्र होती है. सवाल पूछने की परम्परा हमारे घरों में कम ही है. ऐसे में ‘मैं कौन हूँ’,’क्या मैं दूसरों से कुछ अलग सा हूँ’ ऐसे सवाल बालमन को बहुत प्रभावित करते हैं.  दुःख, अवसाद, अकेलेपन और कई बार आत्मघात की ओर भी ले जाते हैं. लक्ष्मी लिखते है –

“नाचना यानी लड़की, औरत.. ऐसा समीकरण हमारे समाज ने बनाया है/ लोग मुझे बायक्या, छक्का, मामू ऐसा कह कर चिढ़ाने लगे थे. मैं नृत्य में अपनी बीमारी भूलने की कोशिश करता था. पर वो आसन नहीं था. मैं एक लड़का था और मुझमें जो कला थी, वो ‘औरत’ की थी…और इसी वजह से समाज की नज़र में मैं कलाकार न होकर ‘बायक्या’ था… नाचने वाला था. लेकिन हैरत तो यह थी कि मैं भी तो सचमुच एक औरत जैसा था. मेरा स्वभाव, मेरा बोलना, मेरा चलना औरतों के जैसा ही था. पर वो वैसा क्यों है, ये समझने के लिए मेरी उम्र काफी नहीं थी. लोगों इस तरह चिढ़ाने से पहले से ही खुद में खोनेवाला मैं और भी अकेला हो गया”

पर ये सिर्फ एक ट्रांसजेंडर की कहानी है, ऐसा कहना गलत होगा. इंसान की सेक्सुअलिटी और उसका जेंडर कन्फर्मेशन उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा मात्र ही तो है, पूरा व्यक्तित्व तो नहीं होते.  इसलिए न लक्ष्मी और न ही उनकी आत्मकथा को सिर्फ एक एंगल से देखना मुनासिब होगा. ये कहानी एक एक्टिविस्ट,एक बेटे, एक दोस्त, प्यार, सेक्स- इन सब की कहानी है. ये किताब एक आम लड़के से सेलेब्रिटी स्टेटस पाने का ब्यौरा है. बेटे के तौर पर परिवार के तरफ होने वाली सर्वसाधारण चिंताओं की, टूटे हुए दिल की, पैसे सम्बन्धी चिंताओं की , सेलेब्रिटी स्टेटस में भी अपने आपको  ढूंढने की, अकेलेपन की कहानी है.

मैं इस किताब के बारे में अगर एक पंक्ति में कुछ कहना चाहूं तो वह होगा कि ये किताब हैं एहसासों और सूचनाओं की, कहीं-कहीं एहसासों की, कहीं-कहीं जानकारियों की और सभी जगह दोनों की. जरुर पढियेगा.

 


सुरभि करवा, राष्ट्रिय विधि विश्विद्यालय, लखनऊ में विधि स्नातक की छात्रा हैं.किताबों को पढ़ते पढ़ते उनका ये एहसास गहरा हुआ कि वो समाजशास्त्र की छात्रा अधिक हैं और कानून को उसका आवश्यक हिस्सा मानती हैं. विधिक सहायता समिति की सदस्य होने के नाते आम जनता में कानूनी जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करती हैं, उनका मानना है कला और साहित्य, ने नयी नयी चीज़ों में दिलचस्पी पैदा कर उनके मिजाज़ को आवारा बन दिया है.