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स्वामी विवेकानंद और वर्तमान

Surbhi Karwa

 

भारतीय दक्षिणपंथी समूहों ने हिन्दू ध्रुवीकरण हेतू व्यापक स्तर पर इतिहास का राजनीतिकरण किया हैं. इतिहास के कई पात्रों का दुरूपयोग ‘हिन्दुत्व एजेंडा’ को बढ़ाने के लिए किया गया है. ऐसा ही एक नाम है- स्वामी विवेकानंद. वे शिकागो धर्म सम्मलेन में हिन्दू धर्म के अग्रणी के रूप में उभरे थे, इस में कोई दोराय नहीं है. पर उन्हें हिन्दू घमंड का मोहरा बनाने का प्रयास भी जारी है. इसलिए जरुरी है कि शिकागो धर्म सम्मलेन के उनके भाषण को पढ़ा- समझा जाये और इस कुचक्र को तोड़कर उनकी विरासत पर पुन: दावा किया जाये.

 

World Parliament of Religions (1983)

शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेनमें स्वामी विवेकानंद अकेले भारतीय नहीं थे. हिन्दुओं के अलग-अलग सम्प्रदायों की ओर से भी अन्य लोग वहां उपस्थित थे.
रामकृष्ण मठ द्वारा प्रकाशित स्वामीजी के भाषणकी प्रस्तावना में स्वयं भगिनी निवेदिता जो स्वामीजी के मुख्य अनुयायियों में थी, इस बात का ज़िक्र करती है. हालांकि इस बात से न तो स्वामी जी की प्रभावशालिता और न ही उनकी प्रतिष्ठा पर फर्क पड़ता है. पर यह बात हमें यह समझाती है कि हिन्दू धर्म कोई कट्टरता से चलने वाला धर्म नहीं था, जैसाकि आज इसे बनाया जा रहा है, यह तो नाना विध सम्प्रदायों का मिश्रण रहा है. स्वयं स्वामीजी अपने भाषण की शुरुआत इसी बात से करते है और सम्पूर्ण भाषण में इन विभिन्न सम्प्रदायों में समान बिंदु खोजने का प्रयास करते है. वे कहते है –

 

“आधुनिक विज्ञान के नवीनतम आविष्कार जिसकी केवल प्रतिध्वनि मात्र हैं, ऐसे वेदान्त के अत्युच्च आध्यात्मिक भाव से लेकर सामान्य मूर्तिपूजा एवं तदानुषंगिक अनेकानेक पौराणिक दन्तकथाओं, और इतना ही नहीं बल्कि बौद्धों के अज्ञेयवाद तथा जैनों के निरीश्वरवाद- इनमें से प्रत्येक के लिए हिन्दू धर्म में स्थान है. तब, प्रश्न यह उठता है कि वह कौन सा एक साधारण बिंदु है, जहाँ पर इतनी विभिन्न दिशाओं में जानेवाली त्रिज्या रेखाएँ केन्द्रस्थ होती है?”

(९ वां दिवस)

 

 

आज धर्म में सवाल पूछने का और आलोचनात्मक अन्वेषण का क्षेत्र कम होता जा रहा है. वही स्वामीजी ने अपने भाषणों में हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के आपसी सम्बन्धों का विश्लेषण ही नहीं किया बल्कि शायद कुछ ऐसी बातें भी कही जो बौद्ध धर्मावलंबियों को चुभी भी होंगी. ( १६ दिवस- ‘बौद्ध धर्म के साथ हिन्दू धर्म का सम्बन्ध’). उन्होंने सभी धर्मों को एक साथ एक मंच पर लाने वाली विश्व धर्म सभा की कई जगह प्रशंसा की और उसकी तुलना बादशाह अकबर की धर्म परिषदों से की (९ वां दिवस). उन्होंने संकीर्णता को आपसी वैमनस्य का कारण बताते हुए धर्म सभा की प्रशंसा की कि ऐसी धर्म सभाएं क्षुद्र सीमाओं को तोड़ती है.

 

“भाइयों ऐसा संकीर्ण भाव ही हमारे कलह का कारण है. मैं हिन्दू हूँ. मैं अपने छोटे से कुँए में बैठा यही समझता हूँ कि मेरा कुआँ ही सम्पूर्ण संसार है. ईसाईं लोग भी अपने क्षुद्र कुँए में बैठे हुए यही समझते हैं कि सारा संसार उसी कुँए में है और मुसलमान भी अपने तुच्छ कुँए में बैठे हुए उसी को सारा ब्रह्माण्ड मानते हैं. मैं आप सब अमेरिकावालों को धन्य कहता हूँ, क्योंकि आप हम लोगों के इन छोटे-छोटे संसारों के क्षुद्र सीमाओं को तोड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं.”

(पंचम दिवस, १५ सितम्बर १८९३)

 

क्या आज हमारे आस-पास इस तरह का वातावरण है जहाँ हम विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर सके ? क्या समस्त धर्म और उनके लोग ऐसी उदारता और हिम्मत रखते है एक ऐसे मंच पर एक साथ आने की जहाँ उनसे सवाल किये जा सके?

 

अपनी बात का अंत करते हुए स्वामीजी के द्वारा प्रथम दिवस दिए गए अपने भाषण में अपना परिचय देते हुए कही गयी बात दोहराती हूँ –

 

“मुझे आपसे यह निवेदन करते हुए गर्व होता है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में अंग्रेजी शब्द exclusion का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं. मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलम्बियों को आश्रय दिया है. मुझे यह बतलाते गर्व होता है कि जिस वर्ष यहूदियों का पवित्र मंदिर रोमन जाती के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया, उसी वर्ष कुछ अभिजात यहूदी आश्रय लेने दक्षिण भारत आये और हमारी जाति ने उन्हें छाती से लगाकर शरण दी. ऐसे धर्म में जन्म लेने का मुझे अभिमान है, जिसने पारसी जाति की रक्षा और उसका पालन अब तक किया है.”

 

क्या वर्तमान हालातों में एक भारतीय विश्व मंच पर स्वयं का इस तरह परिचय दे सकता है? सोचियेगा.

 


 

सुरभि करवा, राष्ट्रिय विधि विश्विद्यालयलखनऊ में विधि स्नातक की छात्रा हैं.किताबों को पढ़ते पढ़ते उनका ये एहसास गहरा हुआ कि वो समाजशास्त्र की छात्रा अधिक हैं और कानून को उसका आवश्यक हिस्सा मानती हैं. विधिक सहायता समिति की सदस्य होने के नाते आम जनता में कानूनी जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करती हैं, उनका मानना है कला और साहित्य, ने नयी नयी चीज़ों में दिलचस्पी पैदा कर उनके मिजाज़ को आवारा बन दिया है.