Of Wandering and Wanderlust
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मिल जाए काश ऐसा बशर ढूंढते हैं हम

 

अभिषेक की कॉल आई थी कि बहुत वक़्त हो गया है,  दद्दा से मिल आते हैं. उनके पाँव में हल्की सूजन भी रहती है तो अपने जानने वाले डॉक्टर को दिखा भी लेंगे..

हमने कहा ठीक और अगला दिन शुरू. उनको डॉक्टर के यहाँ ले जाना, फिर जांच, फिर राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल और….फिर कुछ पहले जैसा नहीं रहा…आजिज़ दद्दा नहीं रहे…जैसे पलक झपकते ही सब हो गया. कभी कभी तो यक़ी नहीं होता..

दद्दा पे हमारे दोस्त अभिषेक शुक्ला और हिमांशु बाजपेयी इतनी सारी बातें कह चुकें हैं कि हम उनके फन पर या उनपे कुछ कहने लायक खुद को पाते नहीं.. पर कुछ छोटी छोटी बातें हैं जो हमें याद आ गयीं. वही साझा कर रहे हैं…और हमारा यक़ीन मानिये ये हम नहीं लिख रहे, हमारे दोस्त हिमांशु, जिनके हुस्न-ए-इसरार के कारण हम लोग उन्हें बांस या स्नूज़ बटन भी कहते हैं वो लिखवा रहे हैं…

शुरू वही से करें जब का हमें याद आता है. बात तब कि है जब अभिषेक बैंक मुलाजिम नहीं हुए  थे इश्क़ में मुब्तिला थे और  बस अदब के नौकर थे. भला हो हमारी साझी दुनिया का कि हम अभिषेक से मिल चुके थे, एक रोज़ अभिषेक ने हमसे कहा कि यहाँ देवा रोड पे, माती गाँव है वहां एक उस्ताद शाइर रहते हैं-हनुमान प्रसाद शर्मा ‘आजिज़’, कल उनके यहाँ चलेंगे और उरूज़ व शायरी पे बात करेंगे…हम अपना वो रजिस्टर जिसमें कुछ सवाल थे, जिसमें अपने नोट्स बनाते थे ले के वहां पंहुचे…सुब्ह से शाम हो गयी…फिर सिलसिला चलता रहा. न जाने कितनी सुब्हें, शाम बनतीं गयीं.

दद्दा हमारे क्या थे ? उस्ताद ? दादा ?? दोस्त ???

जी ! वो शख्स बहुत बड़ा था….और आप उसके साथ बैठ कर ख़ुद को भी इतना बड़ा महसूस करते थे कि उनसे दोस्ती कर सकें.

आजिज़ मातवी

कुछ लोग इस तरह आपके साथ होते हैं कि जब तक वो साथ हों, तब तक आप ये नहीं सोचते कि वो आपके क्या हैं ?

ये बात हमने पहली बार तब सोची जब दद्दा हॉस्पिटल में एडमिट थे. उनकी रिपोर्ट आ चुकी थी, दद्दा को नहीं पता था, हॉस्पिटल में उनकी बेटी और दामाद जी जान से सब देखने में लगे थे तो डॉक्टर चेक अप के बाद जब बाहर आये तो अभिषेक और हमने उनको सीढ़ी के पास रोक के पूछा, कि क्या स्तिथि है ? और डॉक्टर ने हमसे पूछा ये आप के क्या लगते हैं ? आपके दादा हैं ? अभिषेक को पहली दफा कुछ बोलने में मुश्किल जान पड़ी, पर वो जवाब देने की कोशिश कर रहा था, पर लफ्ज़ एहसास का बोझ नहीं उठा सकते थे. हम तो तब से ले के अब तक ये सोच रहे वो शख्स हमारा क्या है. मगर अब तक कोई जवाब नहीं ढूंढ पाए. जिस दिन ढूंढ लेंगे उस दिन आपको भी बता देंगे.

बस शायरी ही नहीं, हमें न जाने कौन कौन से खजाने मिलते रहे हैं. प्रो वारिस किरमानी, आजिज़ दद्दा, और रमेश चंद दिवेदी जी के साथ नाशिस्तों में शायरी के इतर जो बातें होतीं थीं, उनमें फ्रेच से ले के पर्शियन या संस्कृत से ले के अरबी और न जाने क्या क्या, कि हम उसका कुछ हिस्सा ही अपनी झोली में समेट पाते थे..

और भाई साहिब ! कभी न ख़त्म होने वाले लतीफों का कोई मुकाबला ही नहीं…

एक किस्सा याद आता है, जब दद्दा को खून की जांच के लिए ले गए तो जो खून निकाल रहा था, उसकी शक्ल देख के लग रहा था जैसे खून निकालते निकलते उसका खून सूख गया हो… आख़िरी बार न जाने कब हंसा हो…बहरहाल उसको दद्दा ने एक लतीफा सुनाया..

“एक साहिब थे उनके खून में आयरन की कमी पायी गयी, डॉ ने उनकी बेगम से कहा, ‘इनको साग खिलाइए, पालक का,’ बस फिर किया था…नाश्ते से ले के खाने तक, पालक का पराठा…पलक का सूप, पालक आलू, पलक दाल, पलक पनीर ..ले पालक ले पालक, 4-5 रोज़ तक सुब्ह ओ शाम, ले पालक-ले पालक, खाते खाते ऊब कर उन साहिब ने अपनी बेगम से कहा, ’क्या जब तक हगने में सरिया निकलने नहीं लगेगी तब तक पालक ही खिलाती रहोगी ?” फिर वो और हम सब हँसते हँसते लोट पोट हो गए..

माती गाँव में आजिज़ मातवी की मेज़ और उनका चश्मा

हमें बहुत गहरे से ये लगता रहा है कि हमसे पहले की पीढ़ी से हम कुछ ख़ास सीख नहीं पाए और इसका कारण क्या है इसकी तफसील में नहीं जातें हैं, पर उनसे पहले की पीढ़ी यानि जो हमारे यानि लखनऊ के बुजुर्ग हैं हम सब उनसे ही बने हैं उनकी तरह ही देखना, बनना, जीना और मरना चाहते हैं…

आपको यकीन न हो, क्या जवान लोगों में उर्जा होगी, इस दौर से ज्यादा जिंदादिल खुले दिल ओ दिमाग की पीढ़ी रही है हमारे बुजुर्गों की…

अच्छा ! आप किसी शख्स को इसलिए याद रख सकतें हैं कि वो किस तरह गले मिलता था…? जी ! गले मिलना, गले लगाना…यानि दो लोगों के बीच वो सारी हदें, फ़ासले ख़त्म कर देना ही है…दद्दा ऐसे ही थे…आप जब भी मिलिए. उस तरह हमें किसी ने गले नहीं लगाया. आज कल हर कोई एक फासले से मिलता है, हम जब कभी हम दद्दा से मिले उनको प्रणाम किया वो इस कदर आत्मीयता, गर्मजोशी और ख़ुशी से हमसे गले मिलते थे कि वो एहसास सोच के आँखें नम हुई जाती है…

हमें तो कम सहेजना आता है, पर हर लफ्ज़ को कैसे बरता जाए और किस तरह लोक रंग में वो अश्लील नहीं खूब लगने लगता है ये भी हमने इन लोगों से सीखा…जैसे एक दफा आजिज़ दद्दा और प्रो. वारिस किरमानी अवधी उर्दू मुहावरों पे बाते कर रहे थे हम कार ड्राइव कर रहे थे और एक लफ्ज़ कान में आया गांड़. साहिब ! इस लफ्ज़ को कितनी तरीके कितने मुहावरों में बांधा जाता है हमने तो कभी सोचा नहीं था, जब तक हम कार में रहे इस लफ्ज़ पर मुसलसल मुहावरे निकलते रहे…

ये तमाम लोग जबान को भिगो के, बारो मास धूप दिखा के, पाउडर बना के रख चुके थे…और बस उर्दू नहीं…इंग्लिश, हिंदी, संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, अवधी न जाने और क्या क्या, सब जबानें बच्चों की तरह इनके इर्दगिर्द खेला करती थी…

हमारी ज़बान तो ख़राब है ही और नुक्ते तो इधर के उधर लगतें हैं पर दद्दा इतने प्यार से और कायेदे से बताते थे कि जिन लफ्ज़ को उन्होंने एक दफा मुझे पकड़ा दिया कि ‘इसे यूँ कहेंगे’ तो वो ताउम्र सही रहने वाले हैं..उनके साथ जितनी देर बैठो आप सीखते रहोगे,

ग़ज़ल तो हम कम कहते हैं, पर जब मिलते वो पूछते और ध्यान से सुनते थे एक दफा इस्लाह भी करी, एक शेर में उन्होंने कहा कि ‘दिल’ की जगह ‘जी’ कर लो…और फिर बड़ी देर तक दिल और जी का भेद खोलते रहे…खैर ! शेर यूँ था..

 

खड़की खुले तो शोर बहुत ही आता है

बंद करूँ तो जी मेरा घबराता है..

 

शायरी में उन्होंने हम पे कभी कुछ थोपा नहीं, नए पौधों को कैसे बड़ा करना है वो जानते थे बाकी आप बदकिस्मत हुए और इस दौर के उस्तादों से आपका पाला पड़ा हो तो शायद आप मेरी बात बेहतर समझ पायें…

उनके साथ ये बहुत गहरा एहसास हुआ की जबान असल में खिलौना है सही ढंग से पकड़ोगे तो खेलना आ जायेगा और अक्सर वो प्यार से खिलौना कैसे पकड़े बता देते थे…

दद्दा ने लोगों की जिद्द पे एक मकान लखनऊ चिनहट के पास पे बनवा लिया था पर वो पूरे गाँव के आदमी थे उनकी बातों में गाँव की खुशबू थी, और जैसा आदमी हो उस से उसकी सहूलियत से उसकी जबान में ही बात करते थे…

बाएं से: रमेश चन्द्र द्विवेदी; आजिज़ मातवी; प्रो. वारिस किरमानी; नीचे: मोनिका चौहान और डॉ. निर्मल दर्शन

दद्दा की सबसे ख़ास बात ये थी कि वो 2 सीढ़ी उतर कर लोगों से बात कर सकते थे कि सामने वाला बहुत क़ाबिल न भी हो तो भी बाआसानी, पूरी बात, गहरायी से समझ सके इसी लिए बड़ी लम्बी फ़ेहरिस्त थी दद्दा के शगिर्दों की…इन्ही बातों के सिलसिले से आप देखिये आखरी वक़्त में किसी ने उनकी तबीयत पूछने के लिए फ़ोन किया और दद्दा बताने लगे-“यार देखो ! जब तक बस चल रही थी चल रही थी, जब छोटी सी आवाज़ के लिए इंजन खुला तो पता चला, रॉड गड़बड़ है, पिस्टन खराब है, बॉडी जवाब दे रही है, ये भी खराब है वो भी खराब है, ताज्जुब ये कि बस चल कैसे रही थी ?”

शख्स और फन अलग अलग होता है कि नहीं हमें नहीं पता…पर हम सब खुशनसीब हैं कि हमने बहुत प्यारे, सरापा अदब के साथ बैठ के चाय पी है..उनके घर पे तहरी खायी है..या अगर बाहर हों तो उन्होंने पूछा क्या खाओगे और हमने कहा डोसा…

आप कितने भी बड़े हो जाओ मगर बच्चे होने का सुख तभी मिलता है, जब दद्दा जैसे बुजुर्ग आस पास हों जिनसे आप जिद्द भी कर लेते हो, हक भी जाता लेते हो और जो खेल खेल में हमें कितना कुछ सिखा जातें हैं…कि हमको उम्र भर उसका एहसास और हैरत होती रहती है…और हम शुक्रिया के तौर पे बस, आने वाली नस्लों से, उस विरासत का छोटा हिस्सा जो हमें मिला, साझा करते हुए अदा कर सकतें हैं.
सच पूछिए तो दद्दा से मिलना शुरू में हमारे लिए लालच रहा है, कि जितनी देर उनके आस-पास बैठ ले उतनी देर हमारी समझ, हमारे इल्म में इज़ाफा होता रहेगा…

पर बस इतना ही नहीं रहा, उनके साथ बैठ कर हम लखनऊ के उस दौर को देखने लगते जो उन्होंने बस देखा नहीं, जिआ है, हम जैसे लोग जो लखनऊ में नहीं पैदा हुए बल्कि उम्र का एक बड़ा हिस्सा आजमगढ़, बनारस, फैजाबाद, हरदोई, रायबरेली, हल्द्वानी आदि शहरों में बिताते हुए लखनऊ पहुचे…वो अस्ल में लखनऊ खोजते हुए पहुचे और उनको लखनऊ आजिज़ दद्दा लोगों के साथ बैठा मिला. हम हिमांशु जितने किस्मत वाले नहीं की राजा बाज़ार की गलियों में खेलते कूदते बड़े हुए हों और लखनऊ पे उस तरह हक जमा सकें जैसे कोई कहता है हम इसके जने हैं, ये शहर मेरी माँ है, पर किस तरह कोई यशोदा किसी कान्हा को पालकर अपना बनाती है, ये भी एक यात्रा है. जिसके रहस्यों को हम दद्दा जैसे लोगों के नज़दीक रहकर ही समझ सकते हैं. शहर लोगों से बनता है. किस तरह शहर उसका कल्चर, उसके संस्कार लोगों के माध्यम से आपके भीतर का सफ़र तय कर लेते हैं और आप ख़ुद वो शहर होने लग जाते हैं ये देखते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं. आप इतने काबिल कभी नहीं होते कि आप शहर को चुनें, शहर आपको चुनता है, और फिर वो अपने कुछ लोगों के ज़रिये आपके नज़दीक आकर आपकी आत्मा में खुद को घोलने लगता है… आजिज़ दद्दा के क़रीब आकर हम लखनऊ के क़रीब आए, इस शहर की अज़मत को जाना, और फिर इसे चाहने लगे.

हमें नहीं पता कि मस्तो जो लखनऊ में नहीं पैदा हुआ, पुराने लखनऊ में कभी नहीं रहा, वो कितना लखनवी हो पाया, पर अगर वो आपको थोड़ा सा भी लगे तो ये राज़ आप पर फ़ाश हुआ कि सूरज की रौशनी ज़र्रे में कैसे उतरती है.

 

कुछ इम्तियाज़-ए-मज़हब-ओ-मिल्लत नहीं हमें
इक मो
तबर रफ़ीक़-ए-सफ़र ढूंढते हैं हम
जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँडते हैं हम

-आजिज़ मातवी

 


मस्तो